जानिए आज का पंचांग और क्या है स्वास्तिक का महत्त्व
आज का हिन्दू पंचांग
दिनांक – 2 सितम्बर 2024
दिन – सोमवार
विक्रम संवत् – 2081
अयन – दक्षिणायन
ऋतु – शरद
मास – भाद्रपद
पक्ष – कृष्ण
तिथि – अमावस्या प्रातः 07:24 सितम्बर 3 तक
नक्षत्र – मघा रात्रि 12:20 सितम्बर 03 तक तत्पश्चात पूर्व फाल्गुनी
योग – शिव शाम 06:20 तक तत्पश्चात सिद्ध
राहु काल – प्रातः 07:56 से प्रातः 09:31 तक
सूर्योदय – 06:26
सूर्यास्त – 06:52
दिशा शूल – पूर्व दिशा में
ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 04:51 से प्रातः 05:37 तक
अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:14 से दोपहर 01:04 तक
निशिता मुहूर्त- रात्रि 12:16 सितम्बर 03 से रात्रि 01:02 सितम्बर 03 तक
व्रत पर्व विवरण – दर्श अमावस्या, सोमवती अमावस्या (सूर्योदय से सितम्बर 3 सूर्योदय तक), देव सावर्णि मन्वादि, अन्वाधान, पोला
विशेष – अमावस्या के दिन स्त्री-सहवास और तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
स्वस्तिक का महत्त्व क्यों ?
- स्वस्तिक अत्यंत प्राचीनकाल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है । इसीलिए प्रत्येक शुभ और कल्याणकारी कार्य में सर्वप्रथम स्वस्तिक का चिह्न अंकित करने का आदिकाल से ही नियम है ।
- स्वस्तिक शब्द मूलभूत ‘सु’ और ‘अस्’ धातु से बना है । ‘सु’ का अर्थ है – अच्छा, कल्याणकारी, मंगलमय । ‘अस्’ का अर्थ है – अस्तित्व, सत्ता। तो स्वस्तिक माने कल्याण की सत्ता, मांगल्य का अस्तित्व ।
- स्वस्तिक शांति, समृद्धि एवं सौभाग्य का प्रतीक है । सनातन संस्कृति की परम्परा के अनुसार पूजन के अवसरों पर, दीपावली पर्व पर, बहीखाता पूजन में तथा विवाह, नवजात शिशु की छठी तथा अन्य शुभ प्रसंगों में व घर तथा मंदिरों के प्रवेशद्वार पर स्वस्तिक का चिह्न कुमकुम से बनाया जाता है और प्रार्थना की जाती है कि ‘हे प्रभु ! हमारा कार्य निर्विघ्न सफल हो और हमारे घर में जो अन्न, वस्त्र, वैभव आदि आयें वे पवित्र हों ।’
- किसी भी मंगल कार्य के प्रारम्भ में यह स्वस्ति मंत्र बोला जाता है :*
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
- ‘महान कीर्तिवाले इन्द्रदेव ! हमारा कल्याण कीजिये, विश्व के ज्ञानस्वरूप पूषादेव (सूर्यदेव) ! हमारा कल्याण कीजिये, जिनका हथियार अटूट है ऐसे गरुड़देव ! हमारा मंगल कीजिये, बृहस्पतिजी ! हमारे घर में कल्याण की प्रतिष्ठा कीजिये ।’ (यजुर्वेद : २५.१९)
- स्वस्तिक का आकृति विज्ञान स्वस्तिक हिन्दुओं का प्राचीन धर्म-प्रतीक है । यह आकृति ऋषि-मुनियों ने अति प्राचीनकाल में निर्मित की थी। एकमेव अद्वितीय ब्रह्म ही विश्वरूप में फैला है यह बात स्वस्तिक की खड़ी और आड़ी रेखाएँ समझाती हैं । स्वस्तिक की खड़ी रेखा ज्योतिर्लिंग का सूचन करती है और आड़ी रेखा विश्व का विस्तार बताती है । स्वस्तिक की चार भुजाएँ यानी भगवान श्रीविष्णु के चार हाथ । भगवान विष्णु अपने चार हाथों से दिशाओं का पालन करते हैं । देवताओं की शक्ति और मनुष्य की मंगलमय कामनाएँ. – इन दोनों के संयुक्त सामर्थ्य का प्रतीक यानी ‘स्वस्तिक’ !
- सामुद्रिक शास्त्रों के अनुसार भी स्वस्तिक एक मांगलिक चिह्न है। भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण के चरणों में भी स्वस्तिक चिह्न अंकित था ।
- “स्वस्तिक समृद्धि व अच्छे भावी का सूचक है । इसके दर्शन से जीवनशक्ति बढ़ती है । स्वस्तिक के चित्र को पलकें गिराये बिना एकटक निहारते हुए त्राटक का अभ्यास करके जीवनशक्ति का विकास किया जा सकता है । आपके घर की दीवारों पर स्वस्तिक का चिह्न अथवा ॐ का चित्र लगा दीजिये । उसको देखने से भी आपकी आध्यात्मिक आभा (aura) बढ़ेगी और घर में सात्त्विकता बनी रहेगी ।”
